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भैरव महाराज ने काटा था ब्रह्माजी का शीश, जानिए उनकी उत्पत्ति की कथा

शास्त्रों में भैरव महाराज को भयानक स्वरूप वाला और भय से रक्षा करन वाला बताया गया है। भैरव का एक अर्थ भय भी है। वह शिव के स्वरूप और दुष्टों का अंत करने वाले हैं। भैरव महाराज तंत्र के देवता भी है और बुराइयों के संहार के भी। मानव को भय से मुक्ति देकर वह सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। इसलिए शिव की प्रिय नगरी काशी के वह कोतवाल हैं। भैरव महाराज के हैं 64 रूप शास्त्रोक्त मान्यता है कि भैरव महाराज के 64 स्वरूप है और वह 8 भागों में विभक्त हैं। तंत्रशास्त्र में इनकी आराधना का विशेष महत्व है और कापालिक संप्रदाय के वे देवता माने जाते हैं। शिवपुराण के अनुसार कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को दोपहर में महादेव के अंश से भैरव महाराज की उत्पत्ति हुई थी इसलिए इस तिथि को काल भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि दैत्य अंधकासुर के अत्याचार जब बहुत ज्यादा बढ़ गए थे और तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। अपनी शक्ति के घमंड में चूर अंधकासुर ने एक बार महादेव के ऊपर आक्रमण कर दिया। उस समय भगवान शिव ने उस दैत्य के संहार के लिए अपने रक्त से भैरव की उत्पत्ति की। भैरव महाराज ने काटा था ब्रह्माजी का शीश एक मान्यता यह भी है कि महादेव के अपमान से भैरव महाराज की उत्पत्ति हुई थी। सृष्टी के प्रारंभ में ब्रह्माजी ने महादेव की वेशभूषा और गणों को देखकर उनको तिरस्कार करते हुए कटु वचन कहे। शिवजी ने तो अपमान की अवहेलना की, लेकिन उसी समय उनके शरीर से क्रोधित मुद्रा में विशालकाय काया प्रगट हुई और वह प्रचण्ड काया ब्रह्मा का संहार करने के लिए उनकी ओर बढ़ी। ब्रह्माजी उसको देखकर भय से चीख पड़े। तभी महादेव के बीच-बचाव करने पर वह काया शांत हो गई। रुद्र के अंश के यह विशालकाय काया उतपन्न हुई थी इसलिए इनको भैरव नाम दिया गया। महादेव ने बाद में भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया। मान्यता है कि महादेव ने अष्टमी तिथि को ब्रह्माजी का अहंकार नष्ट किया था इसलिए इस तिथि को भैरव अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। यह भी मान्यता है कि ब्रह्माजी के पांच मुख थे। एक बार ब्रह्माजी पांचवे वेद की भी रचना करने जा रहे थे। समस्त देवों ने जब इस संबंध में भगवान महाकाल से ब्रह्माजी को रोकने का आग्रह किया। महादेव को समझाने पर भी जब ब्रह्माजी अपनी बात पर अडिग रहे तो भोलेनाथ के अंश से भैरव महाराज प्रगट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों के प्रहार से ब्रह्मा जी की का पांचवा मुख काट दिया। कहा जाता है कि ब्रह्माजी की शीश काटने पर भैरव महाराज को ब्रह्म हत्या का पाप भी लगा था।

मालवांचल

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